08/04/2026
काश कह पाती - बहुत कुछ अब भी कहना है तुमसे
काश आज फिर तुम्हें ख़यालों में महसूस न किया होता,
काश तुम्हारे साथ बिताया हर पल इतना ख़ास न होता।
ज़ेहन से जाती ही नहीं वह नज़र,
जिससे आख़िरी बार तुमने मुझे देखा था।
वह तुम्हारा मुझे समझाना- कि क्यों बने हैं हम एक-दूसरे के लिए,
और मेरा बस मुड़ जाना, कुछ भी न कहना।
काश आज भी मैं तुम्हारे लिए ज़रूरी होती,
पर तुमसे गिला करने का हक़ ख़ुद ही तो खो दिया मैंने।
मालूम है मुझे तुम अब किसी और के हो,
तुम्हें अपना न कह पाने की वजह मैं खुद थी।
काश तुम्हारा साथ छोड़ देने की वजह
मेरी नादानी न होती,
काश आख़िरी लड़ाई में जीत मेरी न होती।
अब न लड़ने का हक़ है, न कोई शिकायत…
शिकायत भी तब करती जब, इस जुदाई की वजह मैं न होती।
काश तुमने हर वादा निभाया न होता,
बेवजह मुझे इन सन्नाटों में अकेला न छोड़ दिया होता।
किसी और की हो चुकी हूँ अब,
पर तुम्हारा वह मुझे, मुझसे भी ज़्यादा समझना
आज भी भुलाया नहीं जाता।
काश, नादान इश्क़ में मैं न होती,
ज़िंदगी की कहानी शायद कुछ और ही होती।
काश हर कसूर मेरा न होता,
अपने पिता की बेटी की जीत और तुम्हारी प्रेयसी की हार के बीच का
फ़ासला मेरा न होता।
काश आज फिर तुम्हें ख़यालों में महसूस न किया होता…
काश आज फिर तुम्हें ख़यालों में महसूस न किया होता…