29/11/2024
इस जीत की इतना चर्चा क्यों?
भारत को पर्थ टेस्ट जीते 36 घंटे से ज़्यादा हो चुके हैं, मगर इंडियन फैंस की एक्साइटमेंट कम होने का नाम नहीं ले रही। ज़्यादातर क्रिकेट एक्सपर्ट्स इसे भारतीय क्रिकेट इतिहास की सबसे शानदार जीत बता रहे हैं। पर सवाल ये है कि पिछले टूर में जब भारत ने 330 रन चेज़ करते हुए गाबा टेस्ट जीता था, तो इस बार की जीत उससे खास कैसे हो गई? 2018-2021 के दौरे पर भी तो भारत ने ऑस्ट्रेलिया को दो-दो बार हराया था। तो इस बार की जीत में ऐसा क्या खास है कि इसकी चर्चा और उत्तेजना कम होने का नाम नहीं ले रही?
मुझसे पूछें, तो इसकी एक से ज़्यादा वजह मुझे दिखाई देती हैं। 2018-19 के दौरे पर ऑस्ट्रेलिया की टीम में स्टीव स्मिथ और वॉर्नर जैसे धुरंधर सैंडपेपर स्कैंडल के बैन के चलते नहीं खेल रहे थे। 2021 के दौरे में जब भारत की C टीम ने ऑस्ट्रेलिया को हराया, तो एक तरह से उनके लिए झटका था... तब सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि उन्हें कुछ समझ ही नहीं आया। मगर इस बार के दौरे से पहले ऑस्ट्रेलिया पूरी तरह तैयार था। मैंने इतने सालों में ऑस्ट्रेलियन मीडिया में किसी एक दौरे को लेकर इतनी चर्चा नहीं सुनी। ऑस्ट्रेलियन अखबारों में टूर को लेकर हिंदी में हेडलाइन्स दी जा रही थीं। फॉक्स क्रिकेट जैसे हिंदी में कॉमेंट्री की तैयारी कर रहे थे। ऑस्ट्रेलिया के तमाम दिग्गज 3-1 और 4-1 से भारत की भविष्यवाणी करके अपना माइंड गेम खेल रहे थे।
और सबसे ऊपर, ऑस्ट्रेलियन बोर्ड ने भी इस दौरे में जिस तरह से वेन्यू रखे थे, उसी से समझ आ रहा था कि वो किसी भी कीमत पर भारत को हराने के लिए तैयार हैं।उन्होंने पहला मैच पर्थ के Optus Stadium में रखा, जहाँ अब तक हुए चारों मैचों में ऑस्ट्रेलिया बहुत आराम से जीत चुका था। वैसे भी वाका का ग्राउंड हो या Optus, पर्थ की मिट्टी ऐसी है कि ये जगह तेज़ पिचों के लिए जानी जाती है। पहला मैच पर्थ में करवाने के पीछे सोच यही थी कि भारत को पहले टेस्ट में इतनी करारी हार दी जाए कि उसका सारा कॉन्फिडेंस आते ही टूट जाए। दूसरा डे-नाइट टेस्ट पिंक बॉल के साथ एडिलेड में रखा गया। ऑस्ट्रेलिया अपने देश में आज तक एक भी पिंक बॉल टेस्ट नहीं हारा है। पिंक बॉल के सामने बल्लेबाज़ी करना वैसे भी बहुत मुश्किल होता है। तीसरा टेस्ट ब्रिसबेन में रखा गया है। जिसकी पिच हाल-फिलहाल पर्थ से भी तेज़ साबित हुई है। और आखिर के दोनों टेस्ट मेलबर्न और सिडनी में रखे गए, जहाँ पिच थोड़ी बैटिंग के माकूल होती है। लेकिन उन्होंने टूर ऐसे ही बनाया कि पहले तीन मैच में ही भारत को तबाह कर दिया जाए।ऊपर से पहले मैच से रोहित और शुभमन गायब थे। शमी भी टीम में नहीं थे। ऑस्ट्रेलियन्स को लग रहा था कि बस मैच जीतना औपचारिकता भर है। भारतीय टीम जब पहले खेलते हुए 150 पर ऑल आउट हुई, तो उन्हें लगा सब कुछ प्लान के मुताबिक चल रहा है। मगर इसके बाद अगले ढाई दिन में जो बाज़ी पलटी, उसकी किसी ऑस्ट्रेलियन ने कल्पना भी नहीं की थी।
पिछले कुछ सालों में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को कई बार हराया था, मगर इस मैच में भारत की दूसरी पारी शुरू होने के साथ-साथ जिस तरह भारत की लीड बढ़ती गई... ऑस्ट्रेलियन एक-एक विकेट को तरसते रहे... लीड 200, 300, 400 पार होती रही... तमाम पैंतरे आज़माने के बाद भी वो कुछ नहीं कर पाए... पर्थ की 35 डिग्री की गर्मी में उनका शरीर भी टूट रहा था और उनकी अकड़ भी... मैंने इतने सालों में ऑस्ट्रेलियन टीम को इतना असहाय, इतना मजबूर, इतना बेचारा कभी नहीं देखा... एक वक्त बाद वो भारतीय टीम के रहमो करम पर आ गए थे... उन्होंने हिम्मत छोड़ दी थी... आखिर में नीतीश कुमार रेड्डी और कोहली उनको मैदान के एक-एक कोने में मार रहे थे, मगर वो कुछ नहीं कर पाए... पर्थ के जिस मैदान पर वो भारत को मसल देना चाहते थे, उसी मैदान में पूरी ऑस्ट्रेलियन टीम को उल्टा लटका कर उनकी बेंत से पिटाई की जा रही थी... वो चिल्ला रहे थे मगर मन ही मन... जैसे हिंदी फिल्मों में होता है, माफिया को अगर किसी को सबक सिखाना होता है तो वो उसकी जान नहीं लेता बल्कि उसके हाथ-पाँव काटकर उसे छोड़ देता है, ताकि वो न जी सके, न मर सके... एक वक्त के बाद भारत की तरफ से बनाया गया एक-एक रन ऑस्ट्रेलिया को वैसे ही स्लो डेथ दे रहा था।
आज लोगों में जो आप खुशी देख रहे हैं, ये ऑस्ट्रेलियाई टीम को तड़पा-तड़पा कर मारने की ही है... ऑस्ट्रेलिया क्या, शायद ही किसी को याद होगा कि किसी एक मैच में ऑस्ट्रेलियाई टीम इतनी मजबूर लगी... सारी ज़िंदगी उन्होंने लोगों को मजबूर ही किया है, मगर इस मैच में वो जैसी दहाड़ के साथ आए थे और मैच खत्म होते-होते जिस तरह मिमियाने लगे और बाद में मिमियाते-मिमियाते जैसे वो शांत हो गए... उनके शांत हो जाने के इस सुख को वही आदमी समझ सकता है जिसने 90 के दौर में भारत को ऑस्ट्रेलिया में खेलते देखा है... ऑस्ट्रेलियन इतनी जल्दी हार मानने वाले नहीं हैं... वो पलट कर आएंगे... वो इस वक्त इतने बौखलाए हुए हैं, इतने फ्रस्ट्रेटेड हैं जैसे शायद कभी नहीं हुए। मगर हमें इस इंडियन टीम पर भी भरोसा है... ये इंडियन टीम काउंटर पंच देना जानती है... जो तेज़ पिचें और तेज़ गेंदबाज़ भारत के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा हथियार हुआ करते थे, वो खुद आज उनके जी का जंजाल बन गए हैं... भारत को डराने के लिए बाकी मैचों में पिच पर और घास छोड़ी, तो स्टार्क और हेज़लवुड से ज़्यादा बुमराह उसका फायदा उठाएंगे... यशस्वी और कोहली तो फिर भी इनके तेज़ गेंदबाज़ों को खेल लेंगे, मगर बुमराह के साथ शमी भी दूसरे मैच में वापिस आ गए, तो ये बेचारे कहाँ जाकर अपनी जान बचाएंगे, इन्हें खुद नहीं पता... ये चूहे-बिल्ली का खेल अभी डेढ़ महीना और चलने वाला है।लेकिन यकीन मानिए दोस्तों, अगर भारत ने 6 दिसंबर से होने वाला पिंक टेस्ट भी जीत लिया, तो ऑस्ट्रेलिया का गुरूर जिस गड्ढे में जाएगा और उनकी जो हालत होगी... उसका हम सिर्फ अंदाज़ा ही लगा सकते हैं... तब तक इस जीत का मज़ा लीजिए और इंतज़ार कीजिए 6 दिसंबर का।
(Neeraj Badhwar)