17/04/2024
मेरे राम!
तुम्हें, ‘मेरे राम’ कहने में लघुता दिखती है, मन की। क्यूँकि तुम जितने कैकयी के लिये थे, ठीक इतने ही केवट के रहे। जितने दशरथ के लिये थे, उतने ही अंगदपिता बालि के लिये रहे। तुम जितने लक्ष्मण के लिये थे, उतने ही विभीषण के लिये रहे। तुम जितने अयोध्या के प्रासाद के थे, उतने ही वनवासियों के सघन अरण्य अटवी के। सकल संसार के। जड़ चेतन के। तुम उस स्तर तक थे, जहाँ पर स्वयं की तुच्छता का दरश होने लगता है। संकुचित होता है मन। जैसे सब कुछ रेत की भाँति झटककर छोड़कर चलने वाले महामना के समक्ष, स्वार्थ का कृत्य, तभी संभव, हो नहीं पाता। चाहकर भी, उसी समय किया नहीं जा सकता। उसी तरह आपके व्यक्तित्व के समक्ष, नतमस्तक होता है हृदय। वह नहीं कर पाता, क्षुद्रता। तुम्हारा नाम शायद इसी कारण योग की रुद्राक्ष मालाओं से लेकर, लोक की तुलसी माला के मनकों तक बिराजमान हो गया। तुमने घोषणा नहीं की थी कि तुम्हें इस स्तर पर स्मृत किया जाये। मुनादी नहीं की गई थी। सहस्राधिक वर्षों के लिये हृदय में धारण किये रखा जाये। किन्तु आपकी धीरता और गहनता, मानव में, विश्वास का मानक बन बैठी।
तुम कितने हृदयों के भीतर, सदियों से विराजमान रहे। चतुर्दश वर्ष वनवास के व्यतीत किये। किंतु सहस्राधिक वर्षों से लोक हृदय की कुटी में निवसित ही हो...!! ग्रंथ, पुस्तकें और सिद्धान्त व्याकरण की कुछ पंक्तियों को पढ़ लेने वाले ज्ञानीजन भी नहीं जान पाये कि तुम बिल्ववृक्ष की मूल की तरह जनमानस में कितनी गहराई में समाते चले गये। लोक ने तुम्हें सहेजा। जैसे सहेजती है चिरमी की फली, अपने भीतर मजीठी रंग की चिरमी। यह रत्ती भर भी वज़न में अंतर आने नहीं देता, चाहे हज़ारों वर्ष व्यतीत हो जाये। कंचन को तोलने के काम, तभी तो वे आती है। जैसे सहेजता है आक का साधारण फूल, अपने भीतर नरमाई का रेशा। तभी तो तपती लू में, चांदनी के गोटे सा तिर जाता है, पवन में।
सुना था मैंने ज्येष्ठ वैशाख की तपती दुपहरी में सूखे सरोवर के तट पर, “सूखा सरवर कुंण भरै, राम बिना, रघुवीर!” राम तुम चले, बिन खड़ाऊ। लेकिन अनगिन आदिवासियों के देशज गहनों में बचे रह गये अब तक। जो थे बिन सोने के, बिना जड़ाऊ। समय की हलचलों में ओझल से दिख सकते थे, मुख्य धारा से। किन्तु मरुभूमि में बहती भूगर्भिक अन्तःसलिला से तुम सजल, बसे रहे, जन मन मानस में।
मुख्यधारा के समाचारों में जो है, उनसे समानांतर एक व्यापक संसार, और चल रहा है। वे न अंगद है, न हनुमान। न जाम्बवंत, न नल नील। वे निषाद है, वे है शबरी जैसे। वे गिलहरियाँ है नन्हीं नन्हीं सी। जिनकी लायी रेत का कण दिखता नहीं, तुम्हारे अतिरिक्त अन्य किसी को। लेकिन मण भर भाव समर्पित। और मन भर लिये है, राम तुमसे ही उन्होंने। उनकी हर बात में तुम हो। पीढ़ी दर पीढ़ी। जन्म पर गाती हुये वे बिसरतीं नहीं,
“दशरथ जी घर प्रकट भया सुत च्यार
कोई प्रगट भया सुत च्यार।
भरपूर बधाई म्हें लेस्या जी म्हारा राज
गज रथ घोड़ा अर दूजन्ती गाय...”
से लेकर परिणय पर जो कंठ बिना साज के भी गाते रहे हैं, गोबर लिपे आंगन में,
“धीमे पांव धरो रघुराई
आयी है सियाजी रै भौम पराई...!”
यदि व्यवहारिक रूप से देखें तो सोचेंगे कि सीता ने राम के रूप में आखिर ऐसा क्या पा लिया था जो उनके जाने के हजारों वर्षों बाद आज भी उनकी धरती पर उनके सौभाग्य की बड़ाई करते हुए फगुआ में गाया जाता है "धनि धनि हे सिया रउरी भाग, राम वर पायो..." भगवान राम की पूरी युवावस्था निर्वासन में ही निकल गयी, उन्होंने सीता को ऐसा कौन सा सुख दे दिया होगा!
लेकिन ये रहस्य, मात्र लोक जानता है। उसके पास हे रघुनन्दन! तुम्हारी कथाओं की कोथली है। पूरी पोटली है। हाँ ठीक वहीं पोटली, जिसमें द्वापर में भात बांध दिये थे, विप्रवर सुदामा की पत्नी सुशीला ने, कृष्ण के लिये। छप्पन व्यंजनों के थाल परोसे जा रहे है राजसी। उस बीच, मैंने देखा सचमुच ही में आज राम! मुठ्ठी भर चबैना धरते हुये तुम्हारे लिये उसे। जिसके पास पत्तल भी न थी। मन लज्जित भी हुआ, स्वयं की लघुता पर।
रघुकुलतिलक! ये तुम्हें उलाहने दे सकते है, अजोध्या छोड़ने पर। ये तुम्हें झिड़क सकते है, जनकनंदिनी के पगतली में कंटक चुभ जाने पर। वे लिछमण को कह जातीं है, “देबर के नेग तो लेऊ लला...!” वे राम को लेकर, सीता से देउरानी की तरह बात कर सकतीं हैं तो अकेले प्रसव पीड़ा झेलतीं सीता के लिये, अजवाइन के लड्डू भी सांधती हुई, आँचल से छलक आये आँसू भी पोंछ सकतीं है…!
ये सुख और ये दुःख
शास्त्र को नहीं।
शास्त्रज्ञ को सुलभ नहीं।
तुलसीदास जी ने कहा है,
“जो संपति सिव रावनहि, दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि, सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥”
किंतु तनिक मुड़कर जो देखा था आपने सहस्राधिक वर्ष पूर्व जिन लोग लुगाइन, बालबृंद को, वे तुमसे याचना करने नहीं आते।
तुम्हें देकर जाना चाहते है कुछ।
हे रघुनाथ!
उनके लिये तुम्हारा नाम पर्याप्त है,
तुम्हारा हो जाना पर्याप्त है।
तुम हुये,
यह अपने आप में स्वतः आप्त है...!!
जब सब ओर से तप्त होकर
हताश हो उठे भलाई,
तब देखना उस ओर भी, उसे शीतल पवन मिले जायेगी।
जब पीड़ाओं के ज्वार में डूबने लगे
आशाओं की वल्लरी,
तब तुम सहलाना उन्हें भी,
वे अपराजिता बन खिल उठेंगी।
संसार के तिक्त अनुभवों से
जब डिगने लगें आस्थाओं के देवगृह,
तब तुम्हारे जीवन प्रसंग
प्राण प्रतिष्ठा करेंगे,
पुनः आस्था विग्रह की।
हे पुरुषोत्तम!
तुम पर्णकुटी की,
हरीतिमा बनाये रखना।
सात्विक द्युतियों को
बनाये रखना
प्रतिहृदय में अशेष, उज्ज्वल...!!
तुम अभिवादन के आरंभ से,
जीवन के अंत तक
रामनामी की तरह साथ रहना...!!
तुम्हारा जन्म,
विश्वास की धूरी पर
कसौटी है मानव व्यक्तित्व की
उत्कृष्ट संभावना की...!
रामचरितमानस पाठ करते हुये
उस लोक के आंचल को देखना,
जो कितनी बार भीगा करता है...!
मीठे गीत गाते हुये जेवनार करवातीं
जनकपुरी की प्रजा को देखना…!
राम तुम देखना,
एक तुम्हारे होने से
कल्प के अंतिम युग
इस कलियुग तक
अमावस्या की रात्रि में
आलोकित दीप दीपित होते है...!!
इसी हेतु रामनवमी हर बार नव्य होती है, प्रतिवर्ष नवल श्वेतकमल की भाँति...!!